Xanthomonas alfalfae subsp. citrumelonis
बैक्टीरिया
रोग पौधशाला में मुख्य रूप से त्रिपत्रीय संतरों और इसके हाइब्रिड को प्रभावित करता है, उदाहरण के लिए स्विन्गल सिट्रुमेलो। संतरों की अन्य प्रजातियों पर दाग़ सिट्रस कैंकर की तरह होते हैं, लेकिन वे उभरे हुए न होकर चपटे या धंसे हुए होते हैं। पत्तियों पर ये अपने गोलाकार, कत्थई परिगलित केंद्रों से जाने जाते हैं जो प्रायः गिर जाते हैं और कई छेद छोड़ जाते हैं (शॉट-होल प्रभाव)। ये पानी से भीगे हुए किनारों और छितरी पीले आभामंडल से घिरे होते हैं। जीवाणु की अधिक आक्रामक किस्मों से बने दाग़ों के पानी से भीगे किनारे सिट्रस कैंकर की अपेक्षा अधिक स्पष्ट रूप से नज़र आते हैं। समय के साथ, ये बढ़ते हुए आपस में मिलकर कोणीय से टेढ़े-मेढ़े हल्के कत्थई चकत्ते बन जाते हैं। अत्यधिक संक्रमित पत्तियों का हरा रंग उड़ जाता है या धूप से झुलस जाती हैं और जल्द झड़ सकती हैं जिससे पतझड़ हो जाता है।
माफ़ करें, हमें ज़ेंथोमोनस अल्फ़ा अल्फ़ा के विरुद्ध किसी वैकल्पिक उपचार की जानकारी नहीं है। यदि आप ऐसा कुछ जानते हैं जिससे हमें इस रोग से लड़ने में सहायता मिल सकती है, तो कृपया हमसे संपर्क करें। हमें आपके संदेश का इंतज़ार रहेगा।
हमेशा एक समेकित दृष्टिकोण से रोकथाम उपायों के साथ-साथ उपलब्ध जैविक उपचारों को अपनाएं। सिट्रस के जीवाण्विक धब्बों पर नियंत्रण के लिए कोई भी पूरी तरह सफल छिड़काव योजना नहीं है। इसका प्रकोप कम करने के लिए निवारक उपायों और रासायनिक उपचार का मिश्रण आवश्यक है। कॉपर आधारित छिड़कावों का अकेले या एंटीबायोटिक या रसायन मैंकोज़ेब के साथ इस्तेमाल से ठीकठाक नतीजे मिलते हैं। पत्तियों को क्षति पहुँचने से बचाने और जीवाणु में प्रतिरोध का विकास न होने देने के लिए मात्रा धीरे-धीरे कम करते जाना चाहिए।
रोग जीवाणु ज़ेंथोमोनस अल्फ़ा अल्फ़ा के कारण होता है। अपने मेज़बानों पर लक्षणों की तीव्रता के आधार पर जीवाणुओं के तीन विभिन्न उपसमूह हैं। ये खेतों की क्यारियों में प्राकृतिक रूप से हवा के साथ बारिश, ओस गिरने या ऊपरी सिंचाई से फैलते हैं। पत्तियां गीली होने पर खेतों या क्यारियों में कार्य करते समय ये उपकरणों या औज़ारों से भी एक से दूसरे पेड़ तक फैल सकते हैं। पत्तियों पर प्राकृतिक छिद्र या छाल पर रंध्र जीवाणु के प्रवेश बिंदु होते हैं। परंतु, जब नए पेड़ बाग़ानों में रोपे जाते हैं तो जीवाणु मर जाता है और लक्षण धीरे-धीरे गायब हो जाते हैं। हल्की वर्षा के साथ गर्म तापमान (14 से 38 डिग्री सेल्सियस), भारी ओस और तेज़ हवा वाला मौसम रोग के विकास और फैलाव के लिए अनुकूल होता है। इसके विपरीत, जब मौसम गर्म और सूखा होता है तब जीवाणु का विकास और संक्रमण की प्रक्रिया बाधित हो जाती है।